हाईकोर्ट ने धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को चुनौती देने वाली याचिका ख़ारिज की
Updated on
24-04-2026 04:46 PM
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य के बहुचर्चित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि अभी इस कानून के लागू होने की अधिसूचना जारी नहीं हुई है, ऐसे में इसे चुनौती देना समय से पहले है।
यह फैसला चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया। याचिकाकर्ता अमरजीत पटेल ने अधिवक्ता ज्ञानेंद्र कुमार महिलांग के माध्यम से याचिका दायर कर विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 और 29 का उल्लंघन बताया था।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने याचिका की ग्राह्यता पर ही सवाल उठाते हुए इसे खारिज करने की मांग की। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि जब तक अधिनियम लागू नहीं होता, तब तक इसकी संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं किया जा सकता। क्या है मामला छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 19 मार्च 2026 को धर्म स्वातंत्र्य विधेयक पारित किया था। 6 अप्रैल को राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद 10 अप्रैल को अधिसूचना जारी की गई, हालांकि अभी इसके लागू होने की तिथि घोषित नहीं की गई है।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान नए कानून में बल, प्रलोभन, दबाव या धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन को अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
अवैध धर्मांतरण पर 7 से 10 साल तक की सजा और न्यूनतम 5 लाख रुपये जुर्माना महिला, नाबालिग या एससी-एसटी वर्ग के मामलों में 10 से 20 साल तक की सजा सामूहिक धर्मांतरण पर आजीवन कारावास तक का प्रावधान सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे
इसके अलावा, स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को पहले जिला प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य होगा।
दूसरी याचिका भी लंबित मसीही समाज के प्रतिनिधि क्रिस्टोफर पॉल ने भी इसी विधेयक के खिलाफ हाई कोर्ट में अलग याचिका दायर की है। इसमें कानून के प्रावधानों को कठोर और अस्पष्ट बताते हुए दुरुपयोग की आशंका जताई गई है।
सरकार का पक्ष राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए नहीं, बल्कि अवैध और जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए लाया गया है।
फिलहाल हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद विधेयक को लेकर कानूनी बहस जारी रहने की संभावना है।
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