44 साल की उम्र, कद महज 98 सेंटीमीटर (करीब 3 फीट 3 इंच) और वजन सिर्फ 22 किलोग्राम. यानी शारीरिक बनावट किसी चार साल के बच्चे जैसी और हड्डियां इतनी भुरभुरी कि करवट लेने में भी फ्रैक्चर का खतरा. एम्स नई दिल्ली में जब यह मरीज पहुंची, तो डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इस नाजुक शरीर पर ऑपरेशन कैसे किया जाए. महिला करीब एक साल से माहवारी और पेट के निचले हिस्से में भयंकर दर्द झेल रही थी.
सामान्य तौर पर ऐसे मामलों में ओपन सर्जरी की जाती है, लेकिन मरीज की स्थिति देखते हुए चीरा लगाना जानलेवा साबित हो सकता था. एम्स के डॉक्टरों ने लैप्रोस्कोपी (दूरबीन विधि) का जोखिम भरा रास्ता चुना और बिना किसी बड़ी चीर-फाड़ के महिला का गर्भाशय सफलतापूर्वक बाहर निकाल लिया.
बीमारी ने बढ़ा दिया था गर्भाशय का आकार
मरीज एडिनोमायोसिस और पेल्विक एंडोमेट्रियोसिस नाम की दोहरी बीमारी से जूझ रही थी. इसमें गर्भाशय की दीवारें सूजकर मोटी हो जाती हैं, जिससे तेज दर्द और ब्लीडिंग होती है.
जांच में सामने आया कि महिला का गर्भाशय बीमारी की वजह से काफी बढ़ चुका था. साथ ही वह हाई ब्लड प्रेशर और गंभीर ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित थी. हड्डियों में कैल्शियम इतना कम था कि ऑपरेशन टेबल पर मरीज को थोड़ा भी गलत एंगल से घुमाने पर हड्डी टूटने का सीधा खतरा था.
डॉक्टरों के सामने क्या थी असल रुकावट?
स्त्री रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर रीता माहे की देखरेख में जब सर्जरी प्लान की गई, तो टीम के सामने दो मुख्य दिक्कतें थीं:
पेट में जगह की कमी: 22 किलो वजन होने के कारण पेट के अंदर कैमरा और औजार घुमाने के लिए खाली जगह बहुत कम थी.
आंतों से चिपकाव: गर्भाशय पेट की अंदरूनी आंतों से बुरी तरह चिपका हुआ था. जरा सी भी चूक आंतों को फाड़ सकती थी.
ओपन सर्जरी करने पर घाव भरने में महीनों लग जाते और कमजोर हड्डियों के चलते मरीज का लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना और खतरनाक होता. इसलिए डॉक्टरों ने की-होल (छोटे छेद) तकनीक से ही आगे बढ़ने का फैसला किया.
90 मिनट में पूरी हुई जटिल सर्जरी
सर्जनों ने पेट पर कोई बड़ा कट लगाने के बजाय बेहद बारीक छेद किए. इनके जरिए हाई-डेफिनिशन कैमरा अंदर डाला गया और स्क्रीन पर देखकर आंतों को बिना नुकसान पहुंचाए गर्भाशय को धीरे-धीरे अलग किया गया.
पूरी प्रक्रिया करीब 90 मिनट में पूरी कर ली गई और इस दौरान खून का बहाव भी बहुत कम रहा. सर्जरी के तीसरे दिन मरीज को बिना किसी सहारे के चलते देख डॉक्टरों ने उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया.
कम कद और हड्डियों की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह केस एक मिसाल है कि अगर प्लानिंग सही हो, तो जटिल से जटिल शारीरिक बनावट में भी मिनिमल इनवेसिव सर्जरी पूरी तरह सुरक्षित है.