एम्स में मरीज को भर्ती कराने की राशि पर भ्रम, क्या 10 हजार रुपये जमा करने पर ही मिलेगा उपचार
Updated on
04-05-2024 12:35 PM
भोपाल। एम्स भोपाल में इलाज करवाने आने वाले एपीएल (गरीबी रेखा से उपर) मरीजों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है। एम्स प्रबंधन ने इलाज के लिए दस हजार रुपये जमा करवाने के लिए आदेश निकाला, जिसमें लिखा है कि गरीबी रेखा से ऊपर के आने वाले मरीजों को भर्ती करने के पहले दस हजार रुपये की राशि जमा करनी होगी। हालांकि विरोध के बाद इसे वापस ले लिया। अब यह आदेश चर्चा का विषय बना हुआ है।
यह निकाला आदेश
जारी किए गए आदेश के अनुसार, अस्पताल प्रबंधन द्वारा मरीज का खाता खोला जाएगा, जिसमें पहले 10 हजार रुपये जमा करने होंगे। अगर मरीज का उपचार का खर्चा पांच हजार से ज्यादा होता है तो उसे दोबारा खाते में राशि डालनी होगी। उक्त मरीज के खाते का अस्पताल के स्टाप द्वारा मानिटरिंग भी की जाएगी।
दरअसल, पिछले दिनों 19 अप्रैल को एम्स के कार्यवाहक चिकिस्ता अधीक्षक डा. शशांक पुरवार द्वारा एक सर्कुलर जारी किया गया था, जिसमें एपीएल मरीजों के लिए भर्ती के दौरान दस हजार रुपये जमा करने को लिखा गया है। इस मामले में डा. शशांक पुरवार ने बात करने से मना कर दिया है। बता दें कि पहले एपील मरीजों को 350 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जमा करने होते थे।
अधिकारी बोले, 2000 रुपये ही करना होगा जमा
इस मामले में एम्स डायरेक्टर डा. अजय सिंह ने बताया कि एम्स के खिलाफ कोई व्यक्ति भ्रम की स्थित पैदा कर रहा है। प्रबंधन ने पहले एपीएल मरीजों को भर्ती के लिए 10 हजार रुपये जमा करने के लिए सर्कुलर जारी किया था, लेकिन कई मरीज उक्त राशि को जमा करने में सक्षम नहीं थे, इसलिए इस आर्डर को वापस ले लिया है। वहीं फिलहाल एपीएल मरीजों को भर्ती के लिए 2000 रुपये ही जमा करने के लिए कहा गया है।
एक दिन में जमा करना था भर्ती का शुल्क
इस आदेश के अनुसार मरीजों के परिजनों को सर्जरी से 24 घंटे पहले शुल्क जमा करने को कहा गया।आदेश में स्टाफ को निर्देश दिए गए कि मरीज को सर्जरी व अन्य क्रियाकलाप के लिए 24 घंटे पहले ही तय शुल्क जमा करना होगा। इसकी सूचना मरीज व परिजन को दी जाएगी। साथ ही समय से तय फीस जमा कराने के बाद सर्जरी व आपरेशन के लिए फाइल आगे बढ़ेगी। आदेश के अनुसार यह नया नियम इसलिए लागू किया गया, क्योंकि मरीज के खाते में कम बैलेंस होने पर पोर्टल पर एंट्री नहीं हो पाएगी। जिसे रकम के बाद दोबारा करना पड़ता है। इससे कई बार डेटा मिसमैच होने का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा सर्जरी केस, ओटी बिल्स और इलाज से जुड़ी जानकारी अपलोड नहीं होती है।
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