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कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारत और चीन आए एक साथ, भड़क सकते हैं नेपाल के PM बालेन शाह, बढ़ा तनाव

Updated on 01-05-2026 12:28 PM
काठमांडू: भारत सरकार की ओर से इस साल की कैलाश मानसरोवर यात्रा का ऐलान कर दिया गया है। यह यात्रा कुमाऊं के रास्ते पिथौरागढ़ जिले के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथुला दर्रे से होगी। विदेश मंत्रालय ने बताया है कि चीन सरकार के सहयोग से कैलाश मानसरोवर यात्रा इस साल जून से अगस्त के बीच होगी। इस यात्रा के लिए भारत और चीन का सहयोग नेपाल को नाराज कर सकता है। लिपुलेख वह इलाका है, जिस पर नेपाल दावा करता रहा है और भारत इस दावे को खारिज करता रहा है। नेपाल एक्सपर्ट ने इस मुद्दे पर अपनी सरकार से सख्त रवैये की मांग की है।

भारत ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के अलावा लिपुलेख के रास्ते चीन से व्यापार शुरू करने का फैसला किया है। भारत और चीन में जून 2026 से यहां व्यापार फिर से शुरू करने वाले हैं। इस पर नेपाल की ओर से तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है। यह खासतौर से नेपाल पीएम के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी, जो मार्च में ही सरकार में आए हैं।

लिपुलेख पर बढ़ेगा विवाद?

लिपुलेख दर्रा भारत, चीन (तिब्बत) और नेपाल के त्रिकोणीय जंक्शन पर रणनीतिक हिमालयी दर्रा है, जो भारत के उत्तराखंड क्षेत्र को तिब्बत से जोड़ता है। यह वह क्षेत्र है, जिस पर नेपाल अपना दावा करता है। नेपाल में बालेन से पूर्व की केपी ओली सरकार ने इस मुद्दे पर भारत से तनाव बढ़ा लिया था। ऐसे में बालेन शाह सरकार के सामने यह एक नई कूटनीतिक परीक्षा है।

काठमांडुपाटी के संस्थापक रोशन खड़का ने एक्स पर लिखा है कि नेपाल को इस मुद्दे पर सख्ती दिखानी चाहिए। भारत और चीन लिपुलेख के रास्ते मानसरोवर यात्रा और व्यावसायिक गतिविधियां की स्थिति जारी नहीं रह सकती। नेपाल को लिपुलेख में सीमा-शुल्क चौकी स्थापित करते हुए औपचारिक रूप से अपने प्रशासनिक और संप्रभु दावे को पुष्ट करना चाहिए।

नेपाल पहले जता चुका आपत्ति

भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख दर्रे को लेकर विवाद बीते साल भी सामने आया था। उस वक्त की नेपाल सरकार ने लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन व्यापार को फिर से शुरू करने पर आपत्ति जताई थी। इस पर भारत ने नेपाल के दावे को निराधार और ऐतिहासिक तथ्यों से परे बताते हुए खारिज कर दिया था।

नेपाल के सेंट्रल बैंक ने बीते साल 100 रुपए के नए करेंसी नोट जारी किया था तो इस पर इस्तेमाल किए गए नक्शे में भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को अपना क्षेत्र दिखाया था। इससे साफ है कि नेपाल की मौजूदा सरकार भी लिपुलेख पर कुछ ना कुछ आपत्ति दर्ज करा सकता है। हालांकि अभी नेपाल का कोई बयान नहीं आया है

क्या है विवाद

  • भारत और नेपाल के बीच इस विवाद की जड़ में 1816 की गई सुगौली संधि है। सुगौली संधि में काली नदी को दोनों देशों के बीच सीमा के तौर पर माना गया था।
  • नेपाल का दावा है कि नदी लिम्पियाधुरा से निकलती है, जो लिपुलेख दर्रे के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। इसलिए कालापानी और लिपुलेख का क्षेत्र नेपाल का है
  • भारत इस दावे को खारिज करता है और कहता है कि नदी का स्रोत कालापानी गांव के पास के झरने हैं। इससे विवादित क्षेत्र उत्तराखंड के भीतर आ जाता है।
  • नेपाल का तर्क है कि भारत की इस क्षेत्र में गतिविधि उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है। ये मुद्दों को बातचीत से हल करने के पिछले समझौतों को प्रभावित करती है।

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