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भारत और रूस की नई मिलिट्री डील ने उड़ाई दुनिया की नींद! पुतिन और मोदी ने चीन-अमेरिका को दिए 5 बड़े संदेश

Updated on 27-04-2026 05:41 PM
मॉस्को/नई दिल्ली: रूस के लीगल इन्फॉर्मेशन पोर्टल ने हाल ही में भारत के साथ पिछले साल हुए "लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के आपसी आदान-प्रदान" यानि RELOS सैन्य लॉजिस्टिक्स समझौते की जानकारी दी है। इसके तहत दोनों देश एक दूसरे के देश में 3000 सैनिक, 10 लड़ाकू विमान और पांच युद्धपोतों की तैनाती कर सकेंगे। भारत और रूस के बीच किए गये इस सैन्य समझौते की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। रूसी समाचार एजेंसी RT से बात करते हुए भारत के पूर्व एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त) ने लिखा है कि इस समझौते से भारत और रूस ने दुनिया को पांच अहम संदेश दिए हैं।

RELOS समझौता क्या है- इस समझौते के तहत भारत और रूस की थल सेना, नौसेना और वायु सेना एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, बंदरगाहों और हवाई अड्डों का उपयोग कर सकेंगी। इस समझौते के तहत दोनों देश ईंधन, राशन, मरम्मत सेवाएं, स्पेयर पार्ट्स और रखरखाव जैसी सुविधाओं के लिए एक-दूसरे के नेटवर्क का इस्तेमाल कर पाएंगे। इसके अलावा इस समझौते के तहत भारत को रूस के आर्कटिक (जैसे मरमंस्क) और सुदूर पूर्व (जैसे व्लादिवोस्तोक) के बंदरगाहों तक पहुंच मिलेगी जिससे उसकी रणनीतिक पहुंच बढ़ेगी।

मोदी-पुतिन ने दुनिया को क्या पांच संदेश दिए?

भारत-रूस बने हुए हैं रणनीतिक साझेदार- पूर्व एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने आरटी को बताया है कि पेपे एस्कोबार ने मार्च में झूठा दावा किया था कि भारत ने रूस के साथ 'विश्वासघात' किया है लेकिन RELOS समझौते के बाद यह बात सच्चाई से कोसों दूर साबित होती है। इस समझौते के जरिए हिंद महासागर क्षेत्र में रूस की शीत युद्ध के दौर वाली स्थायी सैन्य मौजूदगी फिर से बहाल हो गई है। इसी तर अगर भारत चाहे तो अब उसे रूसी सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्र में भी एक अभूतपूर्व स्थायी सैन्य मौजूदगी हासिल हो जाएगी जो उनकी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी की मजबूती का प्रतीक है। इसलिए उनके बीच किसी भी तरह की दरार को लेकर लगाई जा रही अटकलें पूरी तरह से 'फेक न्यूज' हैं।
चीन पर अत्यधिक निर्भरता से बच रहा रूस- उन्होंने कहा कि रूस के सुदूर पूर्व में भारत की सैन्य उपस्थिति दिल्ली के लिए बीजिंग के मुकाबले प्रतिष्ठा का विषय है। भले ही इस बात की कोई संभावना न हो कि मॉस्को अपने क्षेत्र से आक्रामक अभियानों को मंजूरी देगा। फिर भी चीन और बाकी दुनिया के लिए संदेश स्पष्ट है और वह यह है कि रूस चीन पर अत्यधिक निर्भरता से पहले से ही बच रहा है।

जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान से भारी निवेश की संभावना- पूर्व एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने आरटी को कहा है कि रूस और अमेरिका के बीच चल रही "नई सुलह" वार्ता के तहत यूक्रेन के साथ शत्रुता समाप्त होने के बाद प्रतिबंधों में चरणबद्ध तरीके से ढील दी जा सकती है जिससे संसाधन संपन्न रूसी सुदूर पूर्व में जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान से भारी निवेश हो सकता है। मॉस्को ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि रूस चीन का जागीरदार नहीं है तो ये देश वहां बड़े पैमाने पर निवेश करने में ज्यादा सहज महसूस कर सकते हैं।
रूस चीन को आर्कटिक पर हावी नहीं होने देगा- सीएनएन के साथ साथ कई मीडिया आउटलेट्स लंबे समय से यह डर फैलाते रहे हैं कि रूस चीन का पिछलग्गू बनकर उसे आर्कटिक पर हावी होने देगा और इसीलिए NATO के लिए इस क्षेत्र का सैन्यीकरण करना बेहद जरूरी है। रिटायर्ड एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने लिखा है कि यह बात कभी भी विश्वसनीय नहीं थी और अब RELOS के कारण यह पूरी तरह से गलत साबित हो गई है। क्योंकि RELOS पश्चिमी देशों के अनुकूल भारत को अगर वह चाहे तो, वहां अपनी सैन्य मौजूदगी स्थापित करने की अनुमति देता है।
भारत अब आर्कटिक क्षेत्र में रूस का एक विशेष ऊर्जा भागीदार बना- उन्होंने आरटी को आगे बताया है कि 2024 में पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव के चलते एक प्रमुख चीनी कंपनी ने रूस के 'आर्कटिक LNG 2' मेगाप्रोजेक्ट से हाथ खींच लिया था। इससे रूस के कुछ लोगों को गहरी निराशा हुई जिन्हें उम्मीद थी कि इन खतरों के सामने चीन ज्यादा दृढ़ता दिखाएगा। अब जबकि भारत आर्कटिक क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति स्थापित करने की तैयारी में है और इस तरह अपनी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त साझेदारी का विस्तार इस क्षेत्र तक कर रहा है तो यह उम्मीद की जा रही है कि प्रतिबंध हटने के बाद वहां निवेश के मामले में भारत को अन्य सभी देशों की तुलना में पहली प्राथमिकता दी जाएगी।

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