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अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में अब नहीं होगा भारत का जज, UNSC की 'जंग' के बीच ICJ से 14 साल बाद विदाई, झटका?

Updated on 17-07-2026 12:59 PM
हेग: भारत ने इस हफ्ते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अस्थाई सीट के लिए अपनी दावेदारी पेश की है। लेकिन दूसरी तरफ UN सिस्टम में उसकी मौजूदगी का एक और अहम हिस्सा चुपचाप खत्म होने वाला है। इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) के लिए नॉमिनेशन की समय-सीमा खत्म हो चुकी है और नई दिल्ली ने न्यायाधीश दलवीर भंडारी की जगह लेने के लिए किसी उम्मीदवार का नाम आगे नहीं बढ़ाया है। इससे वर्ल्ड कोर्ट में भारत का 14 साल का कार्यकाल खत्म हो रहा है।

भंडारी 2017 में दोबारा चुने गए थे जिसे उस समय नई दिल्ली में एक कूटनीतिक जीत और 'ग्लोबल साउथ' में भारत की लीडरशिप के सबूत के तौर पर देखा गया था। भारत की तरफ से UNSC की अस्थाई सीट के लिए अभियान शुरू करने से कुछ हफ्ते पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने प्रक्रिया के अनुसार एक ज्ञापन और उसके साथ एक नोट जारी किया था। इसका उद्देश्य फरवरी 2027 से शुरू होने वाले नौ साल के कार्यकाल के लिए ICJ में पांच न्यायाधीशों के चुनाव की प्रक्रिया को औपचारिक रूप से शुरू करना था।

भारत ने ICJ के लिए क्यों दाखिल नहीं किया नामांकन

मेमोरेंडम में बताया गया है कि 'परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' से जुड़े राष्ट्रीय समूहों को अपने नॉमिनेशन दाखिल करने के लिए 24 जून तक यानी साढ़े चार महीने का समय दिया गया था। इस नोट में उन उम्मीदवारों की अंतिम सूची शामिल है जिन्हें समय-सीमा खत्म होने से पहले नॉमिनेट किया गया था। उस सूची में भारत का नाम नहीं है।

नॉमिनेशन की प्रक्रिया अब बंद हो चुकी है इसलिए भारत इस दौड़ में शामिल नहीं हो सकता। अगर कोई अचानक खाली जगह नहीं बनती है तो अगले साल फरवरी में भंडारी के रिटायर होने के बाद 2012 के बाद पहली बार ऐसा होगा कि UN की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था में भारत का कोई जज नहीं होगा।ICJ से भारत का पीछे हटना ऐसे समय में हो रहा है जब UN की दूसरी बड़ी कानूनी संस्थाओं में भी उसकी मौजूदगी कम हो रही है। जून में भारत ने इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल फॉर द लॉ ऑफ द सी (ITLOS) के लिए इंटरनेशनल लॉ के जानकार बिमल पटेल को चुना था। 1 अक्टूबर को ITLOS का पद संभालने के बाद वे इंटरनेशनल लॉ कमीशन से अपनी सीट छोड़ देंगे।

ICJ में भारत का 14 साल का सफर समाप्त

इसके बाद भारत के पास उन तीन संस्थाओं में से सिर्फ ITLOS की सीट होगी जिन्हें वह पारंपरिक रूप से प्राथमिकता देता रहा है। यह उस पैटर्न से अलग है जिसे भारत कम से कम 2010 के दशक के मध्य से बनाए हुए था जब उसके पास तीनों संस्थाओं में एक साथ सीटें थीं।
ICJ की सीट के लिए चुनाव लड़ने का अगला मौका 2029 में होगा लेकिन उस चक्र में भी कोई वास्तविक मौका नहीं दिखता। उस साल एशिया की जो दो सीटें खाली होंगी उन पर अभी मौजूदा जज हैं और जिनके दोबारा चुने जाने की संभावना है जापान के इवासावा युजी (जो कोर्ट के प्रेसिडेंट हैं) और चीन की ज़्यू हानकिन। टोक्यो या बीजिंग में से किसी ने भी अभी तक दोबारा चुनाव लड़ने की घोषणा नहीं की है लेकिन मौजूदा जज खासकर P5 देश के जज और कोर्ट के मौजूदा प्रेसिडेंट शायद ही कभी दूसरा कार्यकाल लेने से इनकार करते हैं।

ICJ से भारत के पीछे हटने के कारण क्या है?

द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने अपना पूरा ध्यान और राजनीतिक पूंजी UNSC की स्थाई/अस्थायी सदस्यता और 'ग्लोबल साउथ' के नेता के रूप में अपनी छवि को मजबूत करने पर केंद्रित कर दी है। 2017 के मुकाबले जब कुलभूषण जाधव के मामले को लेकर ICJ में भारत की सीधी हिस्सेदारी और दबाव था फिलहाल वर्तमान में कोर्ट के सामने भारत के लिए कोई ऐसा तत्काल विवादित मुद्दा नहीं है। इसीलिए भारत को फिलहाल इस सीट के होने या नहीं होने से फर्क नहीं पड़ता।
'द वायर' के मुताबिक भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को कुछ हलकों में भंडारी की जगह भारत का उम्मीदवार बनाने के लिए पसंद किया जा रहा था। एक समय उनसे इस बारे में बात भी की गई थी जबकि सुप्रीम कोर्ट के अन्य मौजूदा और पूर्व जजों के बीच अनौपचारिक लॉबिंग की चर्चा भी चल रही थी।

लेकिन सूत्रों का कहना है कि साउथ ब्लॉक के शीर्ष स्तर पर इस समय बड़े अंतरराष्ट्रीय चुनावों में हिस्सा लेने को लेकर हिचकिचाहट थी। यह सावधानी बिमल पटेल के जून में ITLOS के लिए चुने जाने के बाद देखी गई। उस चुनाव में वियतनाम के बाद 115 वोटों के साथ उन्हें दूसरी सबसे अच्छी स्थिति में जीत मिली थी। पिछली बार भारत की नीरू चड्ढा ने पहले राउंड में 120 वोटों के साथ एशिया-पैसिफिक ग्रुप में टॉप किया था।

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