क्या है अमेरिका की रणनीति?
क्रिटिकल मिनरल्स के लिए अमेरिका कभी चीन तो कभी ऑस्ट्रेलिया की ओर रुख कर रहा है। पिछले साल अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया के साथ 3 अरब डॉलर से ज्यादा का समझौता किया था, जिससे लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और अन्य खनिजों की आपूर्ति बढ़ाई जा सके। ट्रंप प्रशासन में अमेरिका के चीन के साथ रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। अमेरिका ने चीन पर जबरदस्त टैरिफ लगाया था, जिसका जवाब अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स के एक्सपोर्ट को रोककर दिया था। अब अमेरिका चिली के साथ समझौता करने जा रहा है।चीन से मुकाबले की तैयारी
चीन पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका लगातार नए कदम उठा रहा है। अमेरिका और यूरोप लंबे समय से China पर क्रिटिकल मिनरल्स और उनके प्रोसेसिंग के लिए निर्भर रहे हैं। इसी को देखते हुए अमेरिका तेजी से सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करने में जुटा है।भारत कितना है तैयार?
भारत भी क्रिटिकल मिनरल्स यानी रेयर अर्थ के भंडार में लगा हुआ है। रेयर अर्थ मैग्नेट बनाने में भारत अपने प्रोत्साहन कार्यक्रम (इंसेंटिव प्रोग्राम) को लगभग तीन गुना करने की तैयारी कर रहा है। यह राशि 7000 करोड़ रुपये (करीब 788 मिलियन डॉलर) से ज्यादा है।वहीं आयात पर निर्भरता कम करने के अलावा सरकार मैग्नेट-लेस मोटर (बिना मैग्नेट वाली मोटर) पर रिसर्च को भी बढ़ावा देने पर विचार कर रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2026 को अपने केंद्रीय बजट 2026-27 के भाषण में चार खनिज-समृद्ध राज्यों (ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु) में डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने की घोषणा की थी। यह कदम चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के वैश्विक प्रयास के अनुरूप है।


