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टीईटी विवाद पर शिक्षक संगठनों का मोर्चा तैयार:शिक्षक बोले- डर परीक्षा नहीं, नीयत का है, बनाई आंदोलन की रणनीति

Updated on 30-03-2026 11:02 AM
भोपाल, हमारा डर परीक्षा को लेकर नहीं, अधिकारियों की नीयत को लेकर है। यह कहना है शासकीय शिक्षक संगठन मध्यप्रदेश के प्रांताध्यक्ष राकेश दुबे का। टीईटी अनिवार्यता को लेकर प्रदेश में विवाद तेज हो गया है और शिक्षक संगठन अब खुलकर विरोध में आ गए हैं। दुबे ने साफ कहा कि 27 साल बाद अचानक नियम बदलना न केवल अनुचित है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के लिए भी खतरा बन सकता है। इस मुद्दे पर सभी संगठनों ने संयुक्त मोर्चा बना लिया है और जल्द ही बड़े आंदोलन की रूपरेखा सामने आएगी। उधर, विभाग के आदेश से करीब डेढ़ लाख शिक्षकों में असमंजस और असुरक्षा का माहौल है।

नियम खेल शुरू होने से पहले तय होने चाहिए

राकेश दुबे ने कहा कि सभी शिक्षक शासन के तय नियमों के अनुसार ही भर्ती हुए थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि खेल के नियम खेल शुरू होने से पहले तय होने चाहिए, बीच में नहीं बदले जाने चाहिए। उनके मुताबिक, 1995 से 2011 के बीच नियुक्त शिक्षक उस समय की पात्रता परीक्षा और मेरिट प्रक्रिया से आए हैं। अब 27 साल बाद टीईटी अनिवार्य करना “रेट्रोस्पेक्टिव बदलाव” जैसा है, जो न सिर्फ अनुचित है बल्कि कानूनी रूप से भी सवालों के घेरे में है।

क्वालिटी एजुकेशन का तर्क सवालों में 

टीईटी लागू करने के पीछे विभाग का तर्क शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना है। इस पर दुबे ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि गुणवत्ता खराब है, तो फिर राज्य केंद्र से मिलने वाले पुरस्कार क्यों लेता है? उन्होंने कहा कि हर साल रिजल्ट में सुधार, लगातार ट्रेनिंग और नवाचार शिक्षकों की मेहनत का परिणाम है। ऐसे में अचानक नया नियम लागू करना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं विभाग की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।

आदेश में स्पष्टता नहीं, शिक्षकों में असमंजस

दुबे ने आरोप लगाया कि डीपीआई द्वारा जारी आदेश में कई विसंगतियां हैं। इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी और कौन इसके दायरे से बाहर होंगे। उन्होंने कहा कि होली की छुट्टियों के बीच आदेश जारी करना भी संदेह पैदा करता है। “जब वेतन जैसे मुद्दों पर छुट्टी का हवाला दिया जाता है, तो ऐसे अहम आदेश जल्दबाजी में क्यों?”—यह सवाल उन्होंने उठाया।

संयुक्त मोर्चा बनाएगा आगे की रणनीति

शिक्षक संगठनों ने अब “अध्यापक-शिक्षक संयुक्त मोर्चा” बना लिया है। 29 मार्च को हुई बैठक में आगे के आंदोलन की रणनीति तैयार की गई। आजाद अध्यापक संघ की प्रदेश अध्यक्ष शिल्पी शिवान ने कहा कि टीईटी के अलावा वरिष्ठता जैसे मुद्दे भी लंबे समय से लंबित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग खुद स्पष्ट नहीं है कि किन शिक्षकों से परीक्षा दिलानी है, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

आदेश बना विवाद की जड़

दरअसल, लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने हाल ही में आदेश जारी कर कहा है कि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में 5 साल से अधिक समय शेष है, उन्हें टीईटी पास करना अनिवार्य होगा। इसके लिए दो साल की समय सीमा तय की गई है। यदि कोई शिक्षक तय समय में परीक्षा पास नहीं करता, तो उसकी सेवा समाप्त की जा सकती है। इसी आदेश से करीब 1.5 लाख शिक्षकों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन की मांग

विभाग ने यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर लिया है। हालांकि, अन्य राज्यों ने इस मामले में रिव्यू पिटीशन दायर कर राहत की कोशिश की है। मध्यप्रदेश में भी शिक्षक संगठन इसी मांग को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को तुरंत रिव्यू पिटीशन दायर कर शिक्षकों के हित में फैसला लेना चाहिए। टीईटी विवाद अब सिर्फ एक परीक्षा का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह “नीति बनाम न्याय” की लड़ाई बन चुका है। एक तरफ विभाग शिक्षा की गुणवत्ता का हवाला दे रहा है, तो दूसरी ओर शिक्षक अपने अधिकारों और सेवा सुरक्षा की बात कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा रूप ले सकता है, क्योंकि संयुक्त मोर्चा अब प्रदेशव्यापी आंदोलन की तैयारी में जुट गया है।

टेस्ट के लिए 2 साल की समय सीमा तय 

स्कूल शिक्षा विभाग ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर उठाया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि संबंधित शिक्षकों को आदेश जारी होने की तारीख से दो साल के भीतर टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य होगा। अगर कोई शिक्षक तय समय सीमा में टीईटी पास नहीं करता है तो उसे सेवा से हटाया जा सकता है।



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