जिस चीन से 24 लाख करोड़ का ट्रेड, उस पर निर्भरता घटा भारत पर भरोसा कर रहा यह देश, संकेत समझिए
Updated on
09-05-2026 12:32 PM
नई दिल्ली: राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद वियतनाम ी लीडर टो लैम चीन गए तो बहुत कम लोग हैरान हुए। हर बड़ा वियतनामी लीडर ऐसा करता रहा है। यह आर्थिक जरूरत की कड़वी सच्चाई को दिखाता है। बीजिंग वियतनाम का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। इकनॉमिक लाइलाइन। हालांकि, शी जिनपिंग से मिलने के कुछ ही हफ्तों के अंदर टो लैम नरेंद्र मोदी के साथ हाई-लेवल बातचीत के लिए नई दिल्ली पहुंचे। इस दौरे के आखिर तक भारत -वियतनाम ने अपने रिश्तों को 'एन्हांस्ड कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' तक बढ़ा दिया। यह भारत की ओर से किसी भी देश को दी जाने वाली सबसे टॉप डिप्लोमैटिक कैटेगरी है।
दोनों दौरों ने वियतनाम की बैलेंसिंग स्ट्रैटेजी की एक साफ झलक दिखाई। वह चीन पर बढ़ती डिपेंडेंस से निपट रहा है। साथ ही भारत के साथ चुपचाप स्ट्रैटेजिक कोऑपरेशन को गहरा कर रहा है। यह इस क्षेत्र के कई देशों के लिए संकेत है। चीन की विस्तारवादी सोच से पार पाने के लिए भारत पर भरोसा करना ही विकल्प है।
दो दशकों से सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर
वियतनाम के लिए चीन के साथ रिश्तों को मैनेज करना ऑप्शनल नहीं है, यह स्ट्रक्चरल है।
चीन दो दशकों से ज्यादा समय से वियतनाम का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है।
2025 में दोनों देशों का ट्रेड लगभग 256 अरब डॉलर (करीब 24 लाख करोड़) तक पहुंच गया है।
यह आंकड़ा ज्यादातर दूसरे देशों के साथ वियतनाम के आर्थिक जुड़ाव को बहुत छोटा कर देता है।
हाल ही में बीजिंग का दौरा इस सच को दिखाता है। वियतनाम और चीन ने रेलवे कोऑपरेशन बढ़ाया। इसमें उत्तरी वियतनाम को चीन के युन्नान प्रांत से जोड़ने वाली लाओ काई-हनोई-हाइफोंग लाइन पर प्रोग्रेस शामिल है। दोनों देशों ने डिप्लोमेसी, डिफेंस और पब्लिक सिक्योरिटी कोऑर्डिनेशन से जुड़े '3+3' मैकेनिज्म को भी गहरा किया।
चीन का अंदर ही अंदर खतरा
लेकिन, गर्मजोशी के नीचे हनोई के अंदर गहरी स्ट्रैटेजिक चिंता छिपी है। दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ वियतनाम का तनाव अभी भी अनसुलझा और बहुत सेंसिटिव है। बीजिंग इंटरनेशनल कानूनी चुनौतियों और क्षेत्रीय विरोध के बावजूद विवादित 'नाइन-डैश लाइन' के जरिए बड़े समुद्री दावों पर जोर दे रहा है। यह अविश्वास इतिहास में उतना ही है जितना कि जियोपॉलिटिक्स में।
चीन ने 1974 में साउथ वियतनाम से पैरासेल आइलैंड्स पर कब्जा कर लिया था। 2014 में बीजिंग ने वियतनाम के दावे वाले पानी में चल रहे एक सरकारी तेल रिग के आस-पास दर्जनों जहाज तैनात कर दिए। इनमें जंगी जहाज भी शामिल थे। हाल ही में चीन ने इस साल की शुरुआत में स्प्रैटली आइलैंड्स में वियतनामी कंस्ट्रक्शन एक्टिविटीज पर एतराज जताया। इससे एक बार फिर यह पता चला कि बढ़ते ट्रेड संबंधों के बावजूद रिश्ते कितने नाजुक हैं।
यहीं से पिक्चर में आता है भारत
ठीक यहीं पर भारत इस मामले में आता है। लैम के भारत दौरे से डिफेंस, ट्रेड, डिजिटल पेमेंट, हेल्थकेयर, एजुकेशन और रेयर अर्थ कोऑपरेशन से जुड़े 13 एग्रीमेंट हुए। रेयर अर्थ वाला हिस्सा खास तौर पर जरूरी है। इसलिए क्योंकि यह दोनों देशों की चीन के कंट्रोल वाली सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करने की कोशिशों का इशारा करता है। दोनों पक्षों ने 2030 तक आपसी ट्रेड को 25 अरब डॉलर तक बढ़ाने का टारगेट भी रखा है। लेकिन, डिफेंस संबंध पार्टनरशिप का सबसे स्ट्रेटेजिक रूप से जरूरी हिस्सा बना हुआ है। वियतनाम ने ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम, खासकर समुद्री सुरक्षा के लिए डिजाइन किए गए कोस्टल एंटी-शिप वेरिएंट को खरीदने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है।
अगर डील फाइनल हो जाती है तो यह डील लगभग 63 करोड़ डॉलर की हो सकती है। इसमें ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल होगा। यह कदम फिलीपींस की ओर से भारत से पहले ब्रह्मोस खरीदने के बाद उठाया गया है। चीन की समुद्री दादागिरी से परेशान देशों के लिए एक रीजनल डिफेंस सप्लायर के तौर पर भारत की बढ़ती स्थिति को और मजबूत करता है।
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