रिजवान साजन का जन्म जब हुआ, तब उनके माता-पिता मुंबई के घाटकोपर इलाके की झुग्गी में रहते थे। उनके पिता की एक छोटी सी नौकरी थी, लेकिन बड़ा परिवार था इसलिए अच्छे इलाके में नहीं रह सकते थे। लेकिन उन्होंने हिम्मत कर महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) की एक योजना में चॉल के लिए आवेदन कर दिया। लॉटरी में उनके नाम चॉल का एक मकान निकल गया। उस समय चॉल का मकान खरीदने में 33 फीसदी सब्सिडी सरकार की तरफ से मिलती थी, 33 फीसदी लोन मिल जाता था और 33 फीसदी खुद चुकाने होते थे। उनके पिता ने 33 फीसदी रकम का इंतजाम किसी तरह किया और चॉल वाला मकान ले लिया।
रिजवान साजन मुंबई में जब नौकरी ढूंढते-ढूंढते थक गए, तब उन्होंने पुराने संबंधों को खंगालना शुरू किया। उनका एक दोस्त दुबई में रहता था। उन्होंने उसी दोस्त को मदद की चिट्ठी लिखी। जब वह कुवैत में थे तो उनके लिए वह काम करते थे। उस दोस्त ने उन्हें 1993 में उन्हें दुबई बुला लिया और हार्डवेयर का सामान बेचने के काम में लगा दिया। सेल्स का काम तो उन्हें भाता था ही, फिर से नए सिरे से काम शुरू कर दिया।