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भारत-चीन लिपुलेख दर्रे से फिर व्यापार करेंगे:नेपाल ने सीमा विवाद को लेकर विरोध जताया, भारत बोला- यहां से 1954 से ट्रेड हो रहा

Updated on 21-08-2025 12:54 PM

भारत और चीन ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से फिर व्यापार शुरू करने पर सहमति जताई है। यह फैसला 18-19 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान हुआ। बातचीत में लिपुलेख के साथ शिपकी ला और नाथु ला दर्रों से भी कारोबार बहाल करने का फैसला लिया गया।

नेपाल ने इस समझौते पर आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं। उसने भारत और चीन से इस इलाके में कोई एक्टिविटी न करने की अपील की है।

इस पर भारत ने बुधवार को लिखित जवाब में कहा कि लिपुलेख के रास्ते 1954 से व्यापार हो रहा है, जो हाल के सालों में कोरोना और अन्य वजहों से रुका था। अब दोनों देशों ने इसे फिर शुरू करने का फैसला किया है।

भारत का कहना है कि नेपाल के क्षेत्रीय दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। ये एकतरफा दावे मान्य नहीं हैं। भारत ने नेपाल के साथ सीमा विवाद को बातचीत और डिप्लोमेसी से हल करने की इच्छा जताई है।

नेपाली PM अगले महीने भारत दौरे पर आएंगे

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सितंबर में भारत दौरे पर आएंगे। वे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक चीन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट में हिस्सा लेने के बाद 16 सितंबर को भारत पहुंचेंगे।

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री रविवार, 17 अगस्त को काठमांडू पहुंचे और प्रधानमंत्री ओली, विदेश मंत्री अर्जु राणा देउबा और विदेश सचिव अमृत बहादुर राय से मुलाकात की।

बैठक में भारत-नेपाल संबंधों को मजबूत करने, कनेक्टिविटी, व्यापार और विकास सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई।

ओली के भारत दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच कुछ अहम समझौते होने की संभावना है। पिछले साल जुलाई में ओली के प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनका भारत दौरा लगातार टलता रहा है।

नेपाल ने 10 साल पहले भी विरोध जताया था

भारत और चीन ने 10 साल में पहली बार लिपुलेख के रास्ते व्यापार पर चर्चा की है। इससे पहले 2015 में पीएम मोदी की चीन यात्रा के दौरान उन्होंने और तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग ने लिपुलेख के रास्ते व्यापार बढ़ाने का समझौता किया था।

नेपाल ने उस समय भी इसका विरोध किया था, क्योंकि यह फैसला नेपाल से बिना सलाह के लिया गया था। नेपाल ने तब भारत और चीन को डिप्लोमेटिक नोट भेजे थे।



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