पश्चिम ढलान पर, एशिया करेगा दुनिया का नेतृत्व; 'सुपरस्टेट' बनकर उभरे हैं भारत और चीन
Updated on
21-09-2026 12:06 PM
मृत्युंजय राय: क्या पश्चिमी देशों के वर्चस्व का दौर दुनिया में खत्म हो रहा है और उसकी जगह जो नई तस्वीर उभर रही है, वह कैसी है? सर विंस केबल की किताब 'Eclipsing the West: China , India and the Forging of a New World' के केंद्र में यही बात है। विंस केबल ब्रिटेन के पूर्व कैबिनेट मंत्री और अर्थशास्त्री रहे हैं। वह लिखते हैं कि कोई तीन सदी तक दुनिया में पश्चिमी देशों का वर्चस्व रहा, जो ढलान की राह पर है। इसकी जगह दुनिया में एशियाई देशों के नेतृत्व में बहुध्रुवीय व्यवस्था उभर रही है।
विंस केबल एशिया के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। उन्होंने चीन और भारत में हो रहे बदलावों पर दशकों से नजर रखी हुई है। इस किताब में ऐतिहासिक संदर्भ, आर्थिक विश्लेषण और जियो-पॉलिटिकल पहलुओं को शामिल करते हुए बताया गया है कि 21वीं सदी का भविष्य अमेरिका या यूरोप तय नहीं करेगा बल्कि इसमें चीन और भारत की कहीं बड़ी भूमिका होगी।
केबल लिखते हैं कि चीन और भारत 'सुपरस्टेट' बनकर उभरे हैं। दोनों देशों की आबादी किसी भी अन्य देश से अधिक है। उनका क्षेत्रफल भी बड़ा है। चीन जहां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, वहीं भारत भी कुछ समय पहले चौथी बड़ी इकॉनमी बना था और फिलहाल वह छठे नंबर पर है। टेक्नॉलजी में तो माना जाता है कि चीन ने अमेरिका को भी पीछे छोड दिया है।
इसलिए वैश्विक व्यापार, वित्त, सुरक्षा और क्लाइमेट गवर्नेस पर इनका प्रभाव बढ़ रहा है। विंस लिखते हैं कि दुनिया की एक तिहाई आबादी इन्हीं दोनों देशों में रहती है और वैश्विक जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। आज कई मामलों में चीन या तो अमेरिका को टक्कर दे रहा है या उससे आगे निकल चुका है। दूसरी ओर, भारत भी इस सदी के मध्य तक दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
लेखक ने किताब में भारत और चीन में समानताओं के साथ दोनों देश किन बातों में अलग हैं, इसे भी बताया है। वह लिखते हैं कि दोनों ही देशों में ताकतवर सरकारी कंपनियों के साथ डायनेमिक प्राइवेट सेक्टर भी है। दोनों रणनीतिक औद्योगिक नीतियां बना रहे हैं। भारत और चीन अपने विशाल घरेलू बाजार की बदौलत इनोवेशन को बढ़ावा दे रहे हैं और विदेशी पूंजी भी आकर्षित कर रहे हैं।
विंस लिखते हैं कि ये तो दोनों देशों के बीच कॉमन बातें हैं, लेकिन चीन जहां निर्यात आधारित आर्थिक मॉडल पर चल रहा है और वह भारी-भरकम निवेश करता है, वहीं भारतीय इकॉनमी की ताकत उसका सर्विसेज सेक्टर है।
घरेलू कंजम्पशन भी भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम आधार है, जबकि चीन लंबे समय से अपने यहां कंजम्पशन को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। चीन को इसमें कुछ सफलता भी मिली है। विंस दोनों देशों की राजनीतिक व्यवस्था में बड़े अंतर का भी जिक्र करते हैं।
वह लिखते हैं कि चीन में जहां कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही है, वहीं भारत में लोकतंत्र है। विंस लिखते हैं कि शीत युद्ध के खत्म होने तक जहां वैश्विक जीडीपी में पश्चिमी देशों का योगदान करीब 60% था, वह अब घटकर 40% के करीब आ गया है।
दूसरी ओर, चीन और भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स का इसमें योगदान लगातार बढ़ रहा है। वह यह भी बताते हैं कि अमेरिका के वैश्विक व्यापारिक नियमों को लागू करवाने, सुरक्षा गारंटी, क्लाइमेट कमिटमेंट से पीछे हटने के कारण दुनिया में एक पावर वैक्यूम बना है।
इससे एशियाई देशों के लिए इसे भरने का मौका बन रहा है। इसमें खासतौर पर चीन कई जगहों पर अमेरिका को चुनौती देता हुआ दिख भी रहा है।
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